मेघवाल समाज का इतिहास -1

साथियो मेघवाल समाज का इतिहास बहुत ही विड़बनाओ से भरा पड़ा है। हमारे समाज के लोग हमारा इतिहास जानते तक नहीं है। कई इतिहासकारो ने हमारे इतिहास को ढूंढने की कोशिश की उनमे से कुछ लोग ही कामयाब हो पाए है।  मेरी कोशिश रहेगी की हमारे सभी मेघवाल भाईओ तक में यह जानकारी पंहुचा सकू और जो में अपने समाज के बारे में जानता हु वोह अपने भाईओ तक पंहुचा सकू इसमें मुझे गर्व महसूस होगा।  अगर में कही पे गलत हु तो कृप्या मुझे मेरे ईमेल पे अवगत कराये।

सिंधुघाटी /हड़प्पा संस्कृति 

       यु तो मेघवाल समाज का इतिहास हजारो साल पुराना  माना जाता है। हमारी संस्कृति की मूल जड़े  सिंधु घाटी सभ्यता से मिलती है। ईसा  पूर्व पांच हजार साल पहले ताम्र युग की शरुआत हुई थी। और चार हजार साल पहले एक युग आया जिसमे मेसोपोटामिया , हड़प्पा और मिश्र  संस्कृति का उदय हुआ।  यह संस्कृति विक्षित संस्कृति मानी  जाती है। क्योकि इसमें अध्यतन सुविधाएं उपलब्ध थी। मेसोपोटामिया संस्कृति दजला फरात नदी के किनारे फली फूली जिससे उसे अलउ वेद भी कहा जाता है  , हड़प्पा संस्कृति सिंधु घाटी नदी के तट  पे खिली जिससे उसे सिंधुघाटी संस्कृति या सभ्यता भी कहा जाता है , जबकि मिस्र संस्कृति निल नदी के किनारे पे विक्षित हुई जिसे गार्जियन संस्कृति भी कहा जाता है। हम सिंधु घाटी या हड़प्पा संस्कृति के बारे में बात करेंगे जो हमे हमरे मेघवाल समाज के इतिहास को बया करती है।

             

                 हड़प्पा संस्कृति में कई देश शामिल थे जिसमे बांग्लादेश से लेके अफ़ग़ानिस्तान तक का इलाका शामिल था।  कुछ साल पहले एक नक्शा इंटरनेट पे वाइरल हुआ था जिसमे भारत के कुछ ही राज्य ही शामिल किआ गया है जो की मुझे सिर्फ मिथ्या लग रहा है क्योकि सिंधु संस्कृति के अवशेष  कोसाम्बी में मिल चुके है।अगर हम गौर से इतिहास के बारे पे पढ़ेंगे तो सायद बहुत कुछ मिल सकता है।भारत के उत्त्तरप्रदेश,भीहर,झारखंड,मध्यप्रदेश,महाराष्ट्र,छत्तीसगढ़,आंध्रप्रदेश, गुजरात,राजस्थान,पंजाब,हरियाणा,जम्मू कश्मीर,उत्तराखंड और अफ़ग़ानिस्तान,पाकिस्तान तक यह संस्कृति फैली हुई थी। इस संस्कृति का मुख्या शहर सिंधु नदी के किनारे मोहे जो दरों  था। इसके आलावा एक और सहर था जो प्रमुख सहर था जोकि लाहौर के पास रवि नदी के तट पे बसा था जिसे हड़प्पा के नाम से जाना जाता था। सिंधुघाटी सभ्यता मिस्र और मेसोपोटामिया संस्कृति से समृद्ध मणि जाती थी क्योकि यहाँ का सामान्य नागरिक भी सम्म्पन और सुखी था। यह की संस्कृति में जाती व्यस्था नाम का चलन था ही नहीं ,यहाँ के लोग खेतीबाड़ी और कपड़ा बुनकर अपना जीवन बिताते थे। इस सभ्यता के संस्थापक द्रविड़ लोगो को मन जाता है जबकि उनके वंशजो को हाल में शूद्र के रूप में जाने जाते है। यु तो इस सभ्यता अंत कैसे हुआ ये आज तक कोई जान नहीं पाया , किन्तु यह माना जाता है की 2000 -1700 ई.पू. में युरेनेशिया आये हुए आर्यो ने आक्रमण किआ और तहस नहस कर दिया।

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