डेल्टा बहिन को श्रदांजलि स्वरूप कविता

शिक्षा के मंदिर में तुम ये कैसा काम कर बैठे।
तुम तो गुरु की महिमा को बदनाम कर बैठे।

कुछ नही करेगा कानून,हैवानो ने ऐसा सोच लिया।
देखो दरिंदो ने फूल सी बेटी को नोच लिया।

कोई नेता नही बोलेगा,सबके होंट सिले हुए हैं।
क्या उमीद है,प्रशासन से ये सब मिले हुए है।

इन नेताओ को तो बेटी नही बस वोट चाहिए।
क्या न्याय होगा,जहां सबको बस नोट चाहिए।

होता रहा ऐसा अन्याय तो मानवता मर जायेगी।
फिर बेटी कॉलेज पढ़ने के नाम से डर जायेगी।

भेजा था माँ-बाप ने पढ़ने बड़े अरमानो के साथ।
वो बेटी अस्मत खो बैठी कुछ हैवानो के हाथ।

तुमने डेल्टा नही,देश की एक प्रतिभा मारी है।
क्यों घूमते है बेख़ौफ़ ये दरिंदे ,क्या लाचारी है।

अपनी बहिन बेटियां मर रही अब तो आत्म बोध करो।
उत्तर पड़ो सड़को पर,जाहिलों का प्रतिसोध करो।

हे भारत के जवानो अब तो एक हुंकार भरो।
नही कर सकते कुछ तो,चुल्लू भर पानी में डूब मरो।

इन हैवानो से न जाने कितनी बहिने हारी है।
अब कुछ करो,कल अपनी बहिन की बारी है।

कैसे पढ़ेगी बेटियां फिर घर से दूर होकर।
कब तक मरती रहेगी डेल्टाये मजबूर होकर।

सब के सब चुप क्यों है,क्यों कोई बोलता नही है।
खून नही पानी है क्या जो रगो में खोलता नही है।

जीयु मेघवंशी की कलम एक डेल्टा की चीक लिख रही है।
मुझे तो इस डेल्टा में सबकी बहिने दिख रही है।।

दरिंदो की नोची वो लास तुम्हे ललकार रही है।
बाहर निकलो भाइयों बहिन तुम्हें पुकार रही है।।

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