प्राचीन वैदिककाल - पौराणिक काल की सामाजिक व्यवस्था से समय के व्यूह चक्र में कई उलेट फेर आते रहें। समय की परिस्थितियों के अनुकूल सामाजिक परिवर्तन होते रहना स्वाभाविक हैं और वैसे ही नियम, वैधानिक सूत्र बनते रहे हैं तथा आज भी होते जा रहे हैं। समय-समय पर कई ऋषि, महर्षि, ब्रह्मर्षि, विचारक, बौद्धवान, मनीषी पूर्वाचार्यों द्वारा दिशा बोध दिया जाता रहा, वैसे ही सामाजिक, व्यवहारिक, विकासशील गतिविधियों का प्रशस्त होना अनिवार्य तथा प्राकृतिक देन है। महामानव युगपुरूषों ने जब-जब समाज को जैसी दिशा दी वैसा ही दैदीप्य प्रभाव बढ़ता रहा। समय प्राच्य काल में जन्म से जातिगत मान्यता एवं पारस्परिक छाया, दोेष, छुआछूत जैसी घृणित अस्पृश्यता का सर्वथा इतिहास समाज का दर्पण है, इसके द्वारा अतीत काल की घटनाओं को देखा जा सकता है और अघटित घटनाओं का भावी उद्धार-सुधार किया जा सकता है।
मेघवंशी समाज का अस्तित्व
विं. सिं. 1336 (सन् 1280) से पूर्व मेघवंशी जाति का लिखित इतिहास नहीं मिलता। चूंकि इस समय से पूर्व जो विभिन्न उच्च वर्ग के राजपूत, ब्राह्मण, वैश्यादि समुदायों में जन्मजात होकर भी गरीबी पूर्ण सामान्य रूप में सादगी और मानवता का जीवन जीने वाला भी एक वर्ग था। वह यवन साम्राज्य एवं राजाओं, सामंत ठाकुरों से शोषित सर्वथा दुःखी था और सामंत परंपरा में कतिपय राजाओं द्वारा दी जाने वाली प्रथा, बहन-बेटियों के अपहरण, यवन उपद्रोह से क्षुब्ध था जो अपनी मान-मर्यादा-इज्जत बचाना चाहते थे। उसी वर्ग से एक-एक, दो-दो परिवार शोषक तथा कथित सवर्ण नामधारी समाज से निकलते अन्य उद्योग धंधे अपनाकर विभिन्न जनजातियों के नाम से प्रसिद्वि पाने लगे। सप्तऋषि महर्षियों के शब्दावतरण से शुद्धि सात्विक प्रवृत्ति की अहिंसक दयावृत्ति अपनाकर एक समाज की व्युत्पति लगभग विक्रम संवत 1300 (सन् 1243) के बाद रिषी (रिखी) से रिखिया, महर्षि से मेघ के नाम अपभ्रषित शब्द से एक वर्ग विशेष का स्थापन हुआ। जो राजस्थान से होकर अन्यान्य प्रांतों में देश काल एवं सामाजिक व्यवस्था, आश्रम विशेष में अनेक नामों में अपनी पहचान पाने लगा। जिनका मूल आजीविका साधन सूतकताई, वस्त्र-यज्ञोपवीत निर्माता होने के कारण सूत्रकार क्षत्रिय, मेघ, मेघवंशी, मेघवाल समाज से परिचित हुआ।
उसी समाज में जन्मे श्री सायर मेघवंशी (जयपाल गौत्र) एवं श्रीमती मगनीदेवी जो ऊण्डू कश्मीर गांव (बाड़मेर) के निवासी थे। जिनके घर (वि. स. 1406 सेे 1468) के बीच में देवता, महामानव, शक्तिवान, सिद्धसंत, युगपुरूष बाबा रामदेव का अवतरण हुआ।

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