वस्त्रहीन थे आदिमानव, वृक्ष छाल लिपटाई,
जंगली गुफाएं पेड़ों के वासी, मानुषता।।1।।
धन्य धन्य उपकार तुम्हारा, ऐसी विधि अपनाई,
हथचरखा से वस्त्र बनाया, मेघ-ऋषि अनुयायी।। 2।।
सत्य, अहिंसा और शालीनता, मेघों की परछाई,
मिलनसार, गुणवान, मेधावी, सन्तोषी स्वाध्यायी।।3।।
जय जय जयकार तुम्हारी, विश्व कल्याण सुहाई,
हथचरखा से वस्त्र बनाया, मेघ-ऋषि अनुयायी।। 4।।
नैतिकता और नेक कमाई सुसंस्कृति अपनाई,
मानवता के भाव भिगोकर, हर घर खुशहाली छाई।।5।।
मानव धर्म की रक्षा कीन्ही, जाति वर्ण मिटाई,
हथचरखा से वस्त्र बनाया, मेघ-ऋषि अनुयायी।। 6।।
स्वर्ग नरक है इस जीवन में, परलोक कहां से आई,
इधर से जाते देखे सभी को, उधर से आया न कोई।। 7।।
सदाचार सदा सुखदायी, दुराचरण दुखदाई,
हथचरखा से वस्त्र बनाया, मेघ-ऋषि अनुयायी।।8।।
कलियुग में है संघे शक्ति , युग पुरूषों ने बताई,
इस जीवन में सत्य कर्म कर, मेघदूत बन भाई।। 9।।
ज्ञान बोझ है बिन प्रयोग, धैर्य धर क्रोध बुझाई,
हथचरखा से वस्त्र बनाया, मेघ-ऋषि अनुयायी।।10।।
यथा शक्ति से परोपकार कर, भय और भूख मिटाई,
भाग्य भरोसे रहे न कोई, खुद दीपक बन जाई।।11।।
पुनर्जन्म छोड गौड़ अब, मेघ वन्दना गाई,
हथचरखा से वस्त्र बनाया, मेघ-ऋषि अनुयायी।। 12।।
जंगली गुफाएं पेड़ों के वासी, मानुषता।।1।।
धन्य धन्य उपकार तुम्हारा, ऐसी विधि अपनाई,
हथचरखा से वस्त्र बनाया, मेघ-ऋषि अनुयायी।। 2।।
सत्य, अहिंसा और शालीनता, मेघों की परछाई,
मिलनसार, गुणवान, मेधावी, सन्तोषी स्वाध्यायी।।3।।
जय जय जयकार तुम्हारी, विश्व कल्याण सुहाई,
हथचरखा से वस्त्र बनाया, मेघ-ऋषि अनुयायी।। 4।।
नैतिकता और नेक कमाई सुसंस्कृति अपनाई,
मानवता के भाव भिगोकर, हर घर खुशहाली छाई।।5।।
मानव धर्म की रक्षा कीन्ही, जाति वर्ण मिटाई,
हथचरखा से वस्त्र बनाया, मेघ-ऋषि अनुयायी।। 6।।
स्वर्ग नरक है इस जीवन में, परलोक कहां से आई,
इधर से जाते देखे सभी को, उधर से आया न कोई।। 7।।
सदाचार सदा सुखदायी, दुराचरण दुखदाई,
हथचरखा से वस्त्र बनाया, मेघ-ऋषि अनुयायी।।8।।
कलियुग में है संघे शक्ति , युग पुरूषों ने बताई,
इस जीवन में सत्य कर्म कर, मेघदूत बन भाई।। 9।।
ज्ञान बोझ है बिन प्रयोग, धैर्य धर क्रोध बुझाई,
हथचरखा से वस्त्र बनाया, मेघ-ऋषि अनुयायी।।10।।
यथा शक्ति से परोपकार कर, भय और भूख मिटाई,
भाग्य भरोसे रहे न कोई, खुद दीपक बन जाई।।11।।
पुनर्जन्म छोड गौड़ अब, मेघ वन्दना गाई,
हथचरखा से वस्त्र बनाया, मेघ-ऋषि अनुयायी।। 12।।
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